हज़रत मुहम्मद साहब की पैदाइश अरब के एक रेगिस्तान शहर में हुई। उस समय वहां तीन प्रमुख शहर थे, य्थ्रीब, जिसे आज मदीना के नाम से जाना जाता है, वे वहां का एक प्रमुख नखलिस्तान था। दूसरा था ताइफ़ जो अपने अंगूरों के लिए प्रसिद्ध पर्वतों में एक शांत शरण था और तीसरा शहर मक्का जो इन दोनों शहरों के विपरीत एक बंजर घाटी में था,

काबा होने के कारण मक्का एक बड़ा व्यापारिक केंद्र बन गया था, यहां लोग दूर दराज़ शहरों से काबा देखने आते और वहां आकर अपना सामान बेचते। हज़रत मुहम्मद साहब का नाम उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब ने रखा था। जिसका अर्थ है “प्रशंसित”। मुहम्मद नाम अरब में नया था। मक्का के लोगों ने जब अब्दुल मुत्तलिब से नाम रखने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा- ताकि सारे संसार में मेरे बेटे की प्रशंसा की जाए।

हमेशा झगड़ों से अलग रहते और कभी भी अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं करते थे। अपने इन सिद्धांतों पर वे इतना दृढ़ थे कि मक्का के लोग उन्हें ‘अल-अमीन’ नाम से पुकारने लगे थे, जिसका अर्थ होता है ‘एक भरोसेमंद व्यक्ति’। उनके प्रसिद्ध चचेरे भाई अली ने एक बार कहा था “जो लोग उनके पास आते, उनसे और क़रीब हो जाते ।

आज मुस्लिम समाज के लिए ज़रूरी है के वे स्वयं को भटकाने वाले रहनुमाओं से हटाकर हज़रत मुहम्मद साहब के दिखाए सिद्धांतों पर चलें। इसके लिए हदीस की एक घटना का भी उल्लेख प्रस्तुत है जिससे मालूम होगा कि मुहम्मद साहब शांति और अमन की चाहत रखने वाले थे। एक बार एक बेदोइन (मक़ामी क़बायली) मस्जिद-ए-नबावि में आया, उसने मस्जिद के अहाते में पेशाब कर दिया।