सऊदी में इंटरनेट रेडियो के ज़रिए बदलाव लाने की कोशिश?

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इन दिनों हर कोई सऊदी अरब होने वाली हर एक चीज़ पर नज़र रख रहा है. यहाँ होने वाली छोटी से छोटी चीज़ भी इंटरनेशनल खबर और सुर्ख़ियों में आ जाती है. अगर हम सऊदी में होने वाले बदलावों की बात करें तो सिर्फ़ एक ही साल में सूद में कई बड़े बदलाव हुएं है. जिनमें सिनेमा, ड्राइविंग जैसे बड़े कदम शामिल है. सऊदी इन दिनों महिलाओं के अधिकारों की बात की जाती है. लेकिन क्या वाकई में सऊदी महिलाओं को उनके अधिकार दिए जा रहे है?

बीबीसी रिपोर्ट के मुताबिक, एक बेहद अनजान शहर है जहाँ इन्टरनेट रेडियो के ज़रिए सऊदी महिलाओं की आवाज़ दुनिया तक पहुँच पाती है. यहाँ सऊदी महिलाओं के लिए एक कार्यक्रम प्रसारित किया है. इस इन्टरनेट रेडियो का नाम ‘नसव्या एफ़एम’ है. यहाँ जो प्रेजेंटर है वह सऊदी महिलाओं पर होने वाली घरेलू हिंसा के मुद्दों को उठाती है. सऊदी महिलाओं ऐसे-ऐसे अनुभव बताती है जिन्हें सुनकर किसी की भी आँखें भर आयें.

सारा एक 33 साल की पढ़ी-लिखी महिला थी जो नौकरी करती थी और अपने मां-बाप के साथ रहती थी. वो एक दूसरे देश यमन के लड़के से शादी करना चाहती थी.”सारा का सपना तब ख़त्म हो गया जब उसके 22 साल के भाई ने 5 गोलियां उसके शरीर में दाग दीं जबकि वो इस रिश्ते में अपने माता-पिता की इजाज़त से थी.

वर्ल्ड न्यूज़ हिंदी को मिली जानकारी के मुताबिक, तीन हफ़्ते पहले नसव्या एफ़एम ने एक ट्विटर अकाउंट बनाया और बताया कि अब से इस एफ़एम पर एक साप्ताहिक कार्यक्रम प्रसारित होगा जिसमें उस आबादी की आवाज़ होगी जो ख़ामोश रहती है. ट्विटर से उन लोगों को भी न्योता दिया गया जो इस कार्यक्रम के प्रोडक्शन में या कंटेट उपलब्ध करवाने में मदद कर सकते हैं.

UN के मुताबिक 17 मानवाधिकार और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं को सऊदी सरकार ने मई से लेकर अब तक हिरासत में लिया है या गिरफ़्तार किया है. उनमें से कई लोगों पर गंभीर अपराधों के आरोप लगे हैं जिनमें से विदेशी लोगों से संदिग्ध रिश्तों का भी इल्ज़ाम है. अगर दोषी पाए गए तो 20 साल की सज़ा भी हो सकती है.

बीबीसी के मुताबिक, नसव्या एफ़एम में दो प्रेज़ेंटर और नौ महिलाएं हैं जो कंटेट बनाती हैं. इनमें से दो को छोड़कर सभी महिलाएं सऊदी नागरिक हैं और कुछ तो सऊदी में रहती भी हैं. ये महिलाएं बताती हैं कि उनके बीच संपर्क में थोड़ी दिक्कतें आती हैं क्योंकि वे अलग-अलग टाइम ज़ोन में रहती हैं. कुछ को अपना वक्त दूसरी ज़रूरतों को भी देना पड़ता है, जैसे काम या पढ़ाई.प्रेजेंटर अपने को एक कार्यकर्ता कहती हैं जो मीडिया के ज़रिए ख़ुद को अभिव्यक्त करती हैं.