2012 में सनातन संस्था पर कांग्रेस सरकार का डोजियर निष्पक्ष था: चव्हाण

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मुंबई: आतंकी वारदातों में लिप्त सनातन संस्था पर एक बार फिर से बैन लगाने की मांग उठ खड़ी हुई, हालांकि राज्य की बीजेपी सरकार इस कदम को उठाने से बचती हुई नजर आ रही है। महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री दीपक केसरकर ने कहा कि सनातन संस्था पर पाबंदी लगाने की मांग अपरिपक्व बयान है। केसरकर ने कहा कि संस्था पर पाबंदी लगाने की मांग करना अभी जल्दबाजी है। क्योंकि अभी पुलिस मामले की जांच कर रही है।

इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज  चव्हाण ने कहा है कि सनातन संस्था पर पाबंदी को लेकर उनकी सरकार की भूमिका साफ थी। उन्होंने कहा कि कहा कि 2008 में ठाणे में हुए बम विस्फोट के मामले में सनातन संस्था के कार्यकर्ता दोषी पाए गए थे। अदालत ने इस मामले में 14 साल की सजा सुनाई थी। इसके बाद आंतकवाद निरोधक दस्ता (एटीएस) ने सनातन संस्था को लेकर राज्य सरकार को एक रिपोर्ट भेजी थी।

संस्था के इतिहास, एटीएस की रिपोर्ट सहित अन्य सबूतों के साथ तत्कालिन कांग्रेस-राकांपा सरकार ने सनातन संस्था पर पाबंदी लगाने के लिए 11 अप्रैल 2011 को केंद्र सरकार के पास प्रस्ताव भेजा था। उन्होंने कहा कि सनातन संस्था पर पाबंदी का यह प्रस्ताव डा नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के पहले भेजा गया था।

पूर्व मुख्यमंत्री ने बताया कि इस बीच सितंबर 2011 में सनातन संस्था पर पाबंदी की मांग को लेकर बांबे हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई। इस याचिका में केंद्र व राज्य सरकार को प्रतिवादी बनाया गया था। 2012 में इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत में सनातन संस्था पर पाबंदी लगाए जाने का समर्थन किया और केंद्र सरकार को 1 हजार पन्नों की रिपोर्ट भेजी।

बता दें कि सनातन आतंकियों के अड्डों से भारी मात्रा में बम और हथियारों की बरमदगी के बाद सनातन संस्था पर पाबंदी की मांग तेज होती जा रही है।