किसी नेता को संघ का एजेंट बताने से पहले देखे, आपको बरग़ला कौन रहा है?

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जैगम मुर्तजा

एक दिन लिखते हैं हमें कांग्रेस को वोट नहीं देना चाहिए क्योंकि सबसे ज़्यादा नुक़सान कांग्रेस ने किया है। अगले दिन लिखते हैं हम समाजवादी पार्टी या आरजेडी को वोट नहीं देंगे क्योंकि उन्होंने यादवों के अलावा किसी के लिए कुछ नहीं किया। अजीत सिंह, शरद पवार, मायावती और ममता को वोट नहीं देना चाहिए क्योंकि वो बीजेपी के साथ चली जाती हैं। केजरीवाल और ओवैसी बीजेपी के ऐजेंट हैं? बचा कौन? सिर्फ बीजेपी और उसके सहयोगी।

इस तरह के मैसेज हर चुनाव से पहले सोशल मीडिया में आम हो जाते हैं। कुछ मुसलमान नाम वाली आईडी, पेज और कुछ कथित एक्टिविस्ट अचानक इस तरह की पोस्ट करने लगते हैं। कुछ जानबूझकर करते हैं कुछ मोहरा बनते हैं। लेकिन ये तय है कि इस तरह के तमाम मैसेज एक ही फैक्ट्री में तैयार होते हैं। चुनाव के समय मौलाना तीन गुट बनाते हैं। तीनों गुट किसी एक दल को वोट न करने की अपील करते हैं। लेकिन इन तीन में से एक भी बीजेपी के ख़िलाफ नहीं बोलता। ऐसे ही अचानक चुनाव के समय आधा दर्जन अलग अलग बिरादरी के हिमायती बीजेपी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी को ललकारते हुए मैदान में आते हैं। आपको क्या लगता है ये सब स्वतः होता है?

नहीं। ये सब सोचा समझा कैल्कुलेशन है। ऐसे ही 69% वोट विरोध में पड़ने के बावजूद किसी को प्रचंड बहुमत मिल जाता है। उन्हें सियासत में महारथ हासिल हो गई है। इधर बहुसंख्यक किसी भी पार्टी की आलोचना तो करते हैं लेकिन ये कभी नहीं कहते कि हम फला पार्टी को वोट नहीं देंगे। ज़ाहिर है राजनीतिक दल भी उन्हें रिझाने में कसर बाक़ी नहीं रखते। इधर आपके ऐलान के दो नुक़सान हैं। जब आपसे कहलवा दिया गया कि आप फलां पार्टी को वोट नहीं देंगे तो वो आपकी तरफ देखने के बजाए दूसरी तरफ मेहनत करती है। ग़लती से वो सत्ता पा जाए तो आपका दिया हुआ वोट भी नहीं मानती क्योंकि आप पहले ही ऐसा ऐलान कर चुके हैं। इसके बाद आपकी तमाम शिकायतें भी बेमानी ही हैं।

बहरहाल किसी नेता या पार्टी को बीजेपी ये संघ का ऐजेंट बताने से पहले देखें कि आपको असल में बरग़ला कौन रहा है? कौन आपको बीजेपी विरोधी दलों के ख़िलाफ भड़का रहा है? कौन है जो विपक्ष की एकता और उसके वोटों में बंटवारा चाहता है? यही संघ का असली ऐजेंट है। ये सोशल मीडिया का क्रांतिकारी, आपका मौलाना, आपकी गली का छुटभैया, आपकी बिरादरी का कथित नेता और कथित समाजसेवी हो सकता है।

यक़ीन मानिए इन फ्रीलांसर्स को बीजेपी की तरफ से ख़ासा भुगतान होता है। ये आपकी मज़हबी भावनाएं भड़काते हैं और आप उनके बहकावे में आकर समाज में राजनीतिक भ्रम पैदा करते हैं। इसका असर उन सीटों पर सबसे ज़्यादा होता है जो साम्प्रदायिक तौर पर संवेदनशील हैं या जहां हार जीत का फासला बेहद कम होता है। इन लोगों को पहचानिए और ठिकाने लगाना शुरू कीजिए। इसके अलावा कोशिश कीजिए कि चुनाव तक इस तरह के मुद्दों पर सार्वजनिक चर्चा न करें।

अगर आपकी शिकायत है तो डेलिगेशन लेकर सीधे संबंधित पार्टी से मिलो और अपना विरोध दर्ज कराओ। कम से कम उन मैसेज को फाॅर्वर्ड न करो जो राजनीतिक भ्रम फैला रहे हैं। और अगर कोई ऐसा कर रहा है तो उसे सीधे ब्लाक करो क्योंकि वो संघ का असली ऐजेंट है और हमारे समाज में उसके लिए जगह नहीं है।

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