राहुल गांधी को पत्रकार कृष्णकांत का खुला ख़त, ‘छुपी हुई या नरम कट्टरता, खुलकर खेली गई कट्टरता से कम खतरनाक नहीं होती है’

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सैकड़ों हजारों लोग जिंदा हैं जिन्होंने 1984 का दंगा देखा है और उसमें आपकी पार्टी के नेता शामिल थे. पहले आपकी पार्टी ने और फिर भाजपा और मोदी ने भी उनको बचाया, यह अलग बात है. उस वक्त दंगे के बचाव में पीएम होते हुए राजीव गांधी तक ‘बड़ा पेड़ गिरने पर जमीन दरकने’ की बात कह रहे थे, जैसे में गुजरात में ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ का तर्क दिया गया था. 1984 के नरसंहार पर आप सिर्फ माफी मांग सकते हैं. दूसरा कोई रास्ता आपके पास नहीं है.

भाजपा आज जहां पहुंची है और देश को जिस रास्ते ले जाना चाहती है, उसका रास्ता आपकी पार्टी कांग्रेस ने ही खोला था. इंदिरा गांधी का चुनावों में खुलकर हिंदू मुसलमान कार्ड खेलना, राजीव गांधी का शाहबानो प्रकरण, मलियाना जैसा क्रूर सरकारी नरसंहार, आपातकाल, 1984 जैसे धब्बे आपको विरासत में मिले हैं. मोदी जी दिनभर भाषण देते हैं, आप भी देते रहें, लेकिन झूठ, फरेब, पाखंड, कट्टरता यह आपको हरदम हरा देगी क्योंकि इन सब मामलों में भाजपा आपकी बाप है.

नफरत और क्रोध के विरुद्ध प्यार और अमन की बातें तब तक सिर्फ पाखंड हैं, जब तक वह अमल में न लाई जाएं. प्यार, अमन और संविधान का तराना सिर्फ भाषणों में नहीं गाना होता है. वैसा करना भी होता है. नेहरू के बारे में भगत सिंह ने 1928 में लिखा था, ‘प्रान्तीय कान्फ्रेंस की विषय समिति में मौलाना जफर अली साहब के पांच-सात बार खुदा-खुदा करने पर अध्यक्ष पण्डित जवाहरलाल ने कहा कि इस मंच पर आकर खुदा-खुदा न कहें. आप धर्म के मिशनरी हैं तो मैं धर्महीनता का प्रचारक हूं.’ क्या आपमें ऐसा करने की हिम्मत है?

यह सही है कि मनमोहन सिंह ने बेहतर सरकार चलाई थी. संवैधानिक विकास के लिहाज से, आर्थिकी के लिहाज से, सामाजिक विकास के लिहाज से वह एक बेहतर सरकार थी, यह मोदी जी ने साबित किया है. लेकिन जिस धनबल, कॉरपोरेटी ताकत और कट्टरता के दम पर भाजपा चुनाव दर चुनाव जीत रही है, वह आपकी पार्टी का दिया हुआ है. आज अगर भाजपा मीडिया का दमन कर रही है तो यह भी उसे कांग्रेस का दिया वरदान है. कांग्रेस सरकारों ने ही प्रेस आयोगों और ट्राई की उन सिफारिशों को नजरअंदाज किया जिनमें प्रेस अथवा ​मीडिया को स्वायत्तता देने की बात कही गई. मीडिया को नेताओं और पूंजीपतियों की झोली में आपने डाला. अब पूंजीपति जिसके साथ होगा, वह मीडिया को खरीद लेगा.

जब एक पार्टी कट्टरता को उकसा रही हो, तब ज्यादा लोकतांत्रिक होना होता है. कट्टरता के विरुद्ध लोकतंत्र खड़ा होगा, तो कट्टरता शर्मिंदा होगी. जैसा कि प्रेमचंद ने लिखा है, ‘सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है. उसे अपने असली रूप में निकलते शायद लज्जा आती है, इसलिए वह गधे की भांति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल के जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति की खाल ओढ़कर आती है.’ पंजाब में ईशनिंदा कानून के बहाने आपने भी यही खाल ओढ़ ली है.

ईशनिंदा जैसे कानून एक बर्बर समाज में होते हैं. शशि थरूर जिस हिंदू पाकिस्तान से डरे हैं, ईशनिंदा कानून लाकर आपकी पार्टी उसी हिंदू पाकिस्तान में अपना योगदान दे रही है. लोकतंत्र का ढोंग मत ​कीजिए. नेहरू की तरह सच्चे लोकतांत्रिक बनिए. नेहरू इसीलिए बड़ा आदमी है क्योंकि वह अपने विचार और कर्म से बड़ा था. नेहरू के बाद इस देश की राजनीति बौनों और बहुरुपियों से भर गई है. आप भी इनमें से एक दिखने को बेताब हैं तो आपको यह मुबारक. लेकिन यह इस देश के लिए खतरनाक है. छुपी हुई या नरम कट्टरता, खुलकर खेली गई कट्टरता से कम खतरनाक नहीं होती है. कम लिखा ज्यादा समझना. शुक्रिया. आपका….

(लेखक युवा पत्रकार एंव कहानीकार हैं)

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