डिजिटल युग में जज दबाव और तनाव में, फैसला सुनाना मुश्किल: जस्टिस सीकरी

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सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस एके सीकरी ने रविवार को फ्रीडम ऑफ प्रेस इन द डिजिटल एज कार्यक्रम में कहा कि आज के डिजीटल युग में जज तनाव और दवाब में फैसले लिख रहे हैं।

जस्टिस सीकरी ने रविवार (10 फरवरी) को कहा कि न्यायिक प्रक्रिया दबाव में है और किसी मामले पर सुनवाई शुरू होने से पहले ही लोग बहस करने लग जाते हैं कि इसका फैसला क्या आना चाहिए? इसका न्यायाधीशों पर प्रभाव पड़ता है।

जस्टिस सीकरी ने लॉएशिया के पहले सम्मेलन में ‘‘डिजिटल युग में प्रेस की स्वतंत्रता’’ विषय पर चर्चा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता नागरिक और मानवाधिकार की रूप-रेखा और कसौटी को बदल रही है और मीडिया ट्रायल का मौजूदा रुझान उसकी एक मिसाल है।

उन्होंने कहा, ‘‘मीडिया ट्रायल पहले भी होते थे लेकिन आज जो हो रहा है वह यह कि जैसे की कोई मुद्दा बुलंद किया जाता है, एक याचिका दायर कर दी जाती है। इस (याचिका) पर सुनवाई शुरू होने से पहले ही लोग यह चर्चा शुरू कर देते हैं कि इसका फैसला क्या होना चाहिए। यह नहीं कि फैसला क्या ‘है’, (बल्कि) फैसला क्या होना चाहिए। और मेरा तजुर्बा है कि न्यायाधीश कैसे किसी मामले का फैसला करता है, इसका इस पर प्रभाव पड़ता है।’’

जस्टिस सीकरी ने कहा, ‘‘यह उच्चतम न्यायालय में ज्यादा नहीं है क्योंकि जब तक वे उच्चतम न्यायालय में पहुंचते हैं वे काफी परिपक्व हो जाते हैं और वे जानते हैं कि मीडिया में चाहे जो भी हो रहा है उन्हें कानून के आधार पर मामले का फैसला कैसे करना है। आज न्यायिक प्रक्रिया दबाव में है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘कुछ साल पहले यह धारणा थी कि चाहे उच्चतम न्यायालय हो, उच्च न्यायालय हों या कोई निचली अदालत, एक बार अदालत ने फैसला सुना दिया तो आपको फैसले की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। अब जो न्यायाधीश फैसला सुनाते हैं, उनको भी बदनाम किया जाता है या उनके खिलाफ मानहानिकारक भाषण दिया जाता है। ’’

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