राफेल घोटाले पर फ्रांस का मीडिया चुप क्यों?

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प्रशांत टंडन

बेहतर पत्रकारिता के मानदंडों पर यूरोप का मीडिया दुनिया में सबसे अव्वल रहा है. बोफोर्स कांड भी स्वीडन के एक अखबार ने वहां के एक पुलिस अधिकारी के हवाले से सबसे पहले छापा था जिस पर कुछ दिन बाद रेडियो स्वीडन ने खुलासा किया था कि कि बोफोर्स में किसी राजनीतिज्ञ को कमीशन मिला है.

फ्रांस का मीडिया भी बेखौफ पत्रकारिता के लिये जाना जाता है. लेकिन राफ़ेल घोटाले पर उसकी चुप्पी हैरत में डालने वाली है. ल मॉन्द (Le Monde) अपनी बेबाक पत्रकारिता के लिये जाना जाता है और प्रधानमंत्री मोदी का ईमेल इंटरव्यू छापने से इंकार कर चुका है. उसकी शर्त थी कि इंटरव्यू तभी छपेगा जब मोदी उसके संवाददाता से आमने सामने बात करेंगे. लेकिन ल मॉन्द ने अभी तक राफ़ेल घोटाले पर कुछ भी उल्लेखनीय नहीं किया है.

क्या फ्रांस्वा ओलांद का सोशलिस्ट पार्टी का होना कारण है?

फ्रांस के मीडिया में लेफ्ट का बोलबाला है. ल मॉन्द राष्ट्रपति के सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों का खुला समर्थन करता रहा है. लिब्रेशन अखबार भी सेंटर-लेफ्ट रुझान का माना जाता है लेकिन उसने 1993 में सोशलिस्ट राष्ट्रपति फ्रेंकोइस मित्तरां टेप कांड को उजागर किया था जो फ्रांस का वाटर गेट स्कैंडल माना जाता है. राफ़ेल पर लिब्रेशन भी चुप है. सबसे बड़े अखबार वेस्ट फ्रांस (Ouest-France) ने भी अभी तक राष्ट्रपति ओलांद के समय हुये इस घोटाले पर कुछ नहीं लिखा. फ्रांस 24 में भी इस घोटाले की रिपोर्टिंग हुई हो ऐसा लगता नहीं.

मीडिया पार्ट फ्रांस का एक मात्र ऐसा मीडिया प्लेटफार्म है जिसने पूर्व राष्ट्रपति ओलांद का इंटरव्यू छापा जिसमे ये बात आई कि अनिल अंबानी की कंपनी को भारतीय पक्ष (प्रधानमंत्री) की सिफ़ारिश पर डसॉल्ट का पार्टनर बनाया गया. लेकिन ये इंटरव्यू भी तब आया जब भारतीय मीडिया में छपा कि फ्रांस्वा ओलांद की पार्टनर जूली गेट की फिल्म को अनिल अंबानी की कंपनी ने फाइनेंस किया था. मीडिया पार्ट में फ्रांस्वा ओलांद का इंटरव्यू सिर्फ इस बात को रेखांकित करने के लिए था कि अनिल अंबानी को डसॉल्ट का पार्टनर बनाने के पीछे फिल्म का फाइनेंस कारण नहीं था बल्कि प्रधानमंत्री मोदी की सिफ़ारिश थी.

मीडिया पार्ट के संस्थापक एड्वी प्लेनेल ल मॉन्द के संपादक रह चुके हैं और वामपंथी विचारों के माने जाते हैं. ओलांद को अपनी सफाई का मौका देने बाद मीडिया पार्ट ने भी कोई फॉलो अप नहीं किया. फ्रांस में भ्रष्टाचार निरोधक कानून सख्त है और जुर्म साबित होने पर सरकारी ओहदे पर रहे व्यक्ति को दस साल की सज़ा हो सकती है और साथ ही सोशलिस्ट पार्टी को राजनीतिक नुकसान होगा सो अलग.

फ्रांस का मीडिया तभी जागेगा जब भारत में डसॉल्ट को ब्लैकलिस्ट करने की बात ज़ोर पकड़ेगी. अभी डसॉल्ट को भरोसा है कि भारत में सरकार बदल भी गई तो HAL की पार्टनरशिप वाला करार जीवित हो जाएगा और राफ़ेल सौदा बच जाएगा.

अजीब विडंबना है कि फ्रांस का वामपंथी मीडिया भारत की दक्षिणपंथी सरकार की राफ़ेल घोटाले को दबा कर मदद कर रहा है.

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