AMU के अल्पसंख्यक दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ करेगी सुनवाई

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सुप्रीम कोर्ट ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने के मामले को मंगलवार को सात सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेज दिया. इस मामले की सुनवाई देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गेागोई, न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ कर रही थी. इससे पहले केंद्र सरकार के हलफनामें पर AMU ने सुप्रीम कोर्ट से जवाब देने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा था.

बता दें कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यूपीए सरकार की अपील को वापस लेने का हलफनामा दाखिल किया था. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि AMU को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा नहीं दिया जा सकता. सरकार ने अपने हलफनामे में 1967 में अजीज बाशा केस में संविधान पीठ के जजमेंट को आधार बनाया है, जिसमें कहा गया था कि AMU को केंद्र सरकार ने बनाया था ना कि मुस्लिम ने.

केंद्र सरकार ने हलफनामे में 1972 में संसद में  बहस के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बयानों का हवाला दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर इस संस्थान को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया तो देश में अन्य अल्पसंख्यक वर्ग या धार्मिक संस्थानों को इनकार करने में परेशानी होगी. इन सब के बीच केंद्र सरकार ने यूपीए सरकार वक्त एचआरडी मंत्रालय के उन पत्रों को भी वापस ले लिया है जिसमें फैक्लटी ऑफ मेडिसन में मुस्लिमों को 50 फीसदी आरक्षण दिया गया था.

केंद्र ने 1967 के सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के खिलाफ 1981 में संसद में संशोधन बिल पास करते हुए AMU को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया, उसे भी मोदी सरकार ने गलत ठहराया है. हलफनामे में कहा गया है कि इस तरह कोर्ट के जजमेंट को निष्प्रभावी करने के लिए संशोधन करना संवैधानिक ढांचे के खिलाफ है.

एएमयू ने कहा था कि सरकार बदलने के साथ दूसरी सरकार का नजरिया नहीं बदलना चाहिए. एएमयू देश की सबसे पुरानी मुस्लिम यूनिवर्सिटी है. इसे मिला अल्पसंख्यक का दर्जा सभी मुस्लिमों के लिए खास मायने रखता है.केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यूपीए सरकार की अपील को वापस लेने का हलफनामा दाखिल किया था.

विश्वविद्यालय की ओर से मंगलवार को वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन पेश हुए. उन्होंने कहा कि इस मामले में उठा यह मुद्दा काफी अहम है क्योंकि 2002 में टीएमए पई प्रकरण में सात सदस्यीय संविधान पीठ ने इस पहलू पर विचार नहीं किया था कि अल्पसंख्यक संस्थान स्थापित करने की क्या अनिवार्यताएं होंगी.

उन्होंने कहा कि चूंकि अल्पसंख्यक संस्थाओं से संबंधित अनेक विषयों पर विचार करने वाले टीएमए पई मामले में इस सवाल पर विचार नहीं हुआ है, इसलिए इस पर विचार करने की जरूरत है. राजीव धवन की इस दलील को नोट करते हुए पीठ ने कहा कि इस विषय पर सुविचारित निर्णय की जरूरत है. इसलिए यह मामला सात सदस्यीय पीठ को सौंपा जाता है.

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