आरबीआई नहीं चाहता था नोटबंदी, मोदी सरकार की दलीलों को ठुकरा दिया था: आरटीआई

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केंद्रीय बैंक के निदेशक मंडल ने देश की आर्थिक वृद्धि पर नाटेबंदी का अल्पकालीन नकारात्मक प्रभाव पड़ने को लेकर मोदी सरकार को आगाह किया था. बोर्ड ने कहा था कि इस अप्रत्याशित कदम का कालाधन की समस्या से निपटने के लिये कोई ठोस प्रभाव नहीं पड़ेगा. निदेशक मंडल में आरबीआई के मौजूदा गवर्नर शक्तिकांत दास भी शामिल थे.

आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक नोटबंदी के ऐलान के बस ढाई घंटे पहले शाम 5 बज कर तीस मिनट पर हुई थी और बोर्ड की मंज़ूरी मिले बिना प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का ऐलान कर दिया था. आरबीआई ने 16 दिसंबर, 2016 को सरकार को प्रस्ताव की मंज़ूरी भेजी यानी ऐलान के 38 दिन बाद आरबीआई ने ये मंज़ूरी भेजी है.

आरटीआई कार्यकर्ता वेंकटेश नायक की तरफ से कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव पर पोस्ट किये गये बैठक ब्योरो के अनुसार, यह सराहनीय कदम है, लेकिन इसका चालू वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद पर अल्पकाल में नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. निदेशक मंडल की 561वीं बैठक में कहा गया कि ज्यादातर कालाधन नकद रूप में नहीं है, बल्कि सोना और अचल सम्पत्ति के रूप में है और इस कदम का वैसी संपत्ति पर ठोस असर नहीं होगा.

प्रधानमंत्री ने 500 और 1,000 रुपये के नोट को चलन से हटाने की घोषणा की थी, जिसका मकसद कालाधन पर अंकुश लगाना, नकली मुद्रा पर रोक लगाना तथा आतंकवदी संगठनों के वित्त पोषण पर लगाम लगाना आदि था. नकली नोट के बारे में बैठक में कहा गया था कि कुल 400 करोड़ रुपये इस श्रेणी के अंतर्गत हैं, जो कुल मुद्रा का बहुत कम फीसदी है.

गौरतलब है कि नोटबंदी और जीएसटी को लोकसभा चुनाव में पक्ष और विपक्ष दोनों ही बड़ा मुद्दा बना रही हैं. लेकिन अब आरटीआई से हुए इस खुलासे के बाद मोदी सरकार फिर सवालों के घेरे में है. विपक्ष का कहना है कि नोटबंदी का लघु और मझोले उद्योगों पर बुरा असर पड़ा है देश की विकास दर कम हो गई है.

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