सेकुलर दलों ने राजस्थान में मुस्लिमों को सिर्फ एक वोट बैंक बना डाला

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आठ प्रतिशत मुस्लिम मतदाता वाले राजस्थान में मुसलमान सेकुलर दलों की राजनीति के चलते सिर्फ एक वोट बैंक बनकर रह गए है। सत्ता में भागीदारी के तौर पर देखा जाये तो मुसलमान मतदाताओं की मदद से कई सांसद चुने गए, लेकिन मुस्लिम सांसदों की चर्चा की जाए तो मुस्लिम समुदाय से राजस्थान में अब तक के लोकसभा के चुनावी इतिहास में मात्र एक उम्मीदवार झुंझुनू से कैप्टन अयूब खान लोकसभा चुनाव जीत पाए हैं।

कैप्टन अयूब खान झुंझुनू से कांग्रेस के टिकट पर चार बार लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। वे 1984 और 1991 में लोकसभा का चुनाव जीतने में सफल रहे, जबकि 1989 और 1996 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वे 1995-1996 में पीवी नरसिम्हाराव की सरकार में कृषि राज्यमंत्री भी रहे थे। इससे पहले राजस्थान में कांग्रेस ने वर्ष 1951 में जोधपुर लोकसभा सीट से नूरी मोहम्मद यासीन को टिकट दिया था जो निर्दलीय हनुवंत सिंह से एक लाख एक हजार 816 मतों से हार गए थे। उस चुनाव में नूरी मोहम्मद को मात्र 38 हजार 17 मत मिले थे, जबकि हनुवंत सिंह को एक लाख 39 हजार 833 मत मिले थे।

वर्ष 1952 में सांसद हनुवंत सिंह का आकस्मिक निधन होने पर हुए उपचुनाव में काफी कम मतदान हुआ और उसमें कांग्रेस ने फिर से नूरी मोहम्मद यासीन को टिकट दिया। इस बार निर्दलीय जसवंत राज ने यासीन को 38 हजार 344 मतों से हराया।

कांग्रेस ने वर्ष 1957 के लोकसभा चुनाव में जयपुर से सादिक अली को मैदान में उतारा था। वे निर्दलीय हरीशचन्द्र शर्मा से चार हजार 504 मतों से हार गए थे। इसके बाद बीस साल बाद कांग्रेस ने 1977 के लोकसभा चुनाव में नवगठित लोकसभा क्षेत्र चूरू से बीकानेर के निवासी मोहम्मद उस्मान आरिफ को टिकट दिया था, लेकिन कांग्रेस शासन में लगे आपातकाल के विरोध में चल रही देशव्यापी जनता पार्टी की लहर में वे जनता पार्टी के प्रत्याशी दौलतराम सारण से एक लाख 51 हजार 891 मतों से हार गए थे।

कांग्रेस ने वर्ष 1996 में भरतपुर से चौधरी तैयब हुसैन को टिकट दिया जो भाजपा की महारानी दिव्या सिंह से 90 हजार 720 मतों से हार गए। इसके बाद वर्ष 1998 में कांग्रेस ने जयपुर से एम सईद खान गुडऐज को प्रत्याशी बनाया, लेकिन वह भाजपा के गिरधारीलाल भार्गव से एक लाख 38 हजार 971 मतों से हार गए। एक बार फिर कांग्रेस ने 1999 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम प्रत्याशी पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. अबरार अहमद को झालावाड़ से मैदान में उतारा जो भाजपा की वसुंधरा राजे से एक लाख 32 हजार 405 मतों से हार गए।

कांग्रेस ने वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में अजमेर सीट से हबीबुर्र रहमान को टिकट दिया जो भाजपा के रासासिंह रावत से एक लाख 27 हजार 576 मतों से हारे। कांग्रेस ने फिर से 2009 में चूरू से रफीक मंडेलिया को टिकट दिया उन्होंने भाजपा के रामसिंह कस्वां को कड़ी टक्कर दी और मात्र 12 हजार 440 मतों के अंतर से हारे। इसके बाद पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने राजस्थान में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया।

इस बार कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में फिर से चूरू से रफीक मंडेलिया को ही प्रत्याशी बनाया है, जिनका मुकाबला भाजपा के मौजूदा सांसद राहुल कस्वां से है। इससे पहले रफीक मंडेलिया राहुल कस्वां के पिता से वर्ष 2009 के चुनाव में हार चुके हैं। इस तरह देखें तो कांग्रेस ने 19962, 1967, 1972, 1980 और 2014 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान में एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था।

राजस्थान में कांग्रेस की ओर से एक ही मुस्लिम उम्मीदवार जीत पाया है, लेकिन इसकी भरपाई करते हुए उसने अब तक आठ मुस्लिमों को राज्यसभा में भेजा है। कांग्रेस ने राजस्थान से सबसे पहले राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे बरकतुल्ला खान को 1952 से 1960 तक राज्यसभा में भेजा। सादिक अली 1958 से 1970 तक, मोहम्मद उस्मान आरिफ 1970 से 1985 तक, ऊषी खान 1976 से 1982 तक, मोहम्मद असरारूल हक 1980 से 1986 तक, डॉ. अबरार अहमद 1988 से 1994 तक, एए खान दुरूमियां 1998 से 2004 तक, अश्कअली टॉक 2010 से 2016 तक कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सदस्य रहे। भाजपा ने भी राजस्थान से नजमा हेपतुल्ला को 2004 में राज्यसभा में भेजा था।

राजस्थान के मुसलमान कांग्रेस को एकमुश्त वोट देते रहे रहें हैं, लेकिन उसकी तुलना में उनको राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। कांग्रेस मुसलमानों को भाजपा का डर दिखाकर उनके वोट लेती रही है। राजस्थान सरकार में भी मुस्लिम समाज के मात्र एक विधायक को मंत्री बनाया गया है, जो उनकी अनुपातिक दृष्टि से बहुत कम है।

गत विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 15 मुस्लिमों को टिकट दिया था, जिनमें से आठ जीतने में कामयाब रहे हैं। कभी राजस्थान में कांग्रेस के दो दर्जन से अधिक मुस्लिम विधायक होते थे, लेकिन अब कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में भी मुसलमानों को टिकट देने की संख्या घटा दी है। जिस कारण उनका विधानसभा में भी प्रतिनिधित्व कम हो गया है।

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