मोदी के “87-88 में डिजिटल कैमरा, ईमेल” और “बादलों के पार न देख पाने वाले राडार” जैसे बयानों का कारण

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प्रशांत टंडन

एहसान जाफरी, इशरत जहां, अखलाक, पहलू खान, जज लोया दिन रात मोदी का पीछा करते हैं. मोदी की इमेज 2002 में कैद हो चुकी है और वो इससे निकलने की कोशिश में तमाम गलतियां करते हैं. बीच बीच में करन थापर और टाइम मैगज़ीन का महाविभाजनकारी का टाइटिल उनकी तमाम कोशिशों पर पानी फेर देते हैं.

मोदी की टीस है कि इतने बड़े बहुमत से प्रधानमंत्री बनने के बाद भी बुद्धिजीवी ने सभ्य समाज में इनकी स्वीकर्यता नहीं बनने दी. इसी वजह से वो खान मार्केट गैंग और लुटियन डेल्ही जैसे जुमले इस्तेमाल करते हैं. पोस्ट ट्रूथ या उत्तर सच काल के सभी नेताओं के साथ यही समस्या है. डोनाल्ड ट्रंप की भी यही समस्या है और उनका भी झगड़ा बुद्धिजीवी से ही है.

1984 का अतीत कांग्रेस का भी पीछा करता है लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस उससे निबट लेते है क्योकि वो गलती मानने में देर नहीं करते, जैसा सैम पित्रोदा के बयान के बाद राहुल गांधी ने किया. कांग्रेस सिखों को प्रतिनिधित्व देने में कभी पीछे नहीं हटी. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाना हो या सिख विरोधी हिंसा वाले क्षेत्र से अरविंदर सिंह लवली को पार्टी का उम्मीदवार बनाना हो.

मोदी यही नहीं कर पाये और आलोचना के दबाव में उन्होने शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर गाड़ कर अपना एक कम्फर्ट ज़ोन बना लिया और उसी में रहते हैं. अपनी बनाई इस दुनिया से बाहर निकालने की जब भी कोशिश करते हैं उन्हे करन थापर दिखाई दे जाता है और वो वापिस उसी दुनिया में लौट जाते हैं जहां उनकी फकीरी, थकते क्यों नहीं है और आम कैसे खाते हैं पर बात होती है.

इसी कम्फर्ट ज़ोन के सहारे 2002 की इमेज का तोड़ निकालने के लिए मोदी बड़ी लकीर खींचने की कोशिश करते हैं और जग हंसाई का कारण बन जाते हैं. मोदी 2002 की छवि से बाहर निकलने के लिये गलत टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं.

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