जिस इलाके में मुसलमानो की तादाद बढ़ जाती उस इलाके को लोग पाकिस्तान कहने लग जाते है। एक दोस्त यूनाइटेड किंगडम में है उन्होंने कहा-लंदन और बर्मिंघम तो मिनी पाकिस्तान हो गया है। हालांकि ऐसा बिल्कुल नहीं कि उन शहरों में बस पाकिस्तानी लोग ही है सारी दुनिया के मुस्लिम वहां है।

हम पहले इंदौर के रानीपुरा में रहते थे तो लोग कहते थे यह तो पाकिस्तान है फिर खजराना आए तो लोगो ने कहा – अरे यह तो पूरा मिनी पाकिस्तान है। पहले हमारे इलाके को भयंकर तरह से बदनाम कर रखा था, उस इलाके में मत जाइए खतरनाक है। अब इस इलाके में चारो तरफ नॉन वेज खानों के रेस्तरां है। औरतें स्कर्ट पहनकर भी पूरी सुरक्षा के साथ आती है। उन लोगों ने जाना-इतने खतरनाक नहीं है यार हमे तो लगता था पूरा पाकिस्तान होगा।

लगभग सारे देश में मुस्लिम इलाको का यही हाल है और लोगो का यही नज़रिया है। मुंबई के मुम्ब्रा और नागपाडा में जाओ तो लोग कहते मिनी पाकिस्तान है। भोपाल के काज़ी कैम्प में कदम रखिए तो वहां भी यही सुनने को मिलता-मिनी पाकिस्तान है जी।

मतलब पहले तो हमे बहुसंख्यक के साथ रहने नहीं देते और फिर हम भेला होकर रहते तो लोग कहते पाकिस्तान है। जिये तो जिये कैसे!

अभी कल ही कि बात है। एक उच्च शिक्षित और कॉरपोरेट में काम करने वाली पूरी तरह से आधुनिक लड़की बता रही थी कि मुझे और मेरे पति को इंदौर के आलोक नगर में धार्मिक भेद के कारण किसी ने फ्लैट नहीं दिया। मैं बेंगलौर से यहां शिफ्ट हुई हूँ। मैंने कहा-आप मेरी बिल्डिंग में रह लीजिए। तो उसका जवाब था – मैं मुस्लिम घेट्टो में नहीं रहना चाहती क्योंकि लोगो को लगता है पाकिस्तान से आ रही हूं। ख़ैर उसे तो एक मानवतावादी ब्राह्मण दोस्त की मदद से कहीं और फ्लैट दिला दिया गया।

हमारे सारे इलाके पाकिस्तान हो जाते है। सीधे उस कंगाल देश से मिलाया जाता है जैसे मुसलमान बस उस कंगाल और कासिस्ट देश में ही रह रहे है। किसी ने यह नहीं कहा – आपका इलाका इस्तांबुल है अंकारा है। इस्तांबुल में भी चारो तरफ मस्जिदे ही मस्जिदे है बिल्कुल ऐसी ही हमारे इलाके में होती। कोई यह नहीं कहता-आप मिनी टर्की में रहते है। हमे जब भेजा भी जाता तो पाकिस्तान ही भेजा जाता है। कोई टर्की नहीं भेजता कोई मलेशिया नहीं भेजता, बस ले देकर वही कंगला देश।

शादाब सलीम की कलम से निजी विचार….