क्या दलित-पिछड़ों की राजनीति में सियासी अछूत बन गया देश का मुसलमान?

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अल्पेश ठाकोर भी बीजेपी में जा रहे हैं। अठावले पासवान, नीतीश समेत कई वहां पहले से हैं। उदित राज हाल में जूते खाकर लौटे हैं। अब अगर हम कहें कि दलित, ओबीसी मुसलमानों को इस्तेमाल करते हैं और फिर धोखा देकर भाग जाते हैं तो आपको बुरा लगता है। सवर्ण मुस्लिम एकता की बात कीजिए एकदम अशराफ अजलाल और दलित, पस्तमांदा गैंग सक्रिय हो जाता है। मुसलमानों के बीच विभाजन पैदा किए जाते हैं।

ठीक है भाई सवर्ण मुसलमान, सवर्ण हिंदुओं से भी क्रूर है और कथित पस्तमांदा का राजनीतिक/सामाजिक हक़ मार रहे हैं। हिंदू दलित मुसलमान पस्तमांदा के सबसे बड़े शुभचिंतक हैं… बस इस शुभ चिंता में शुभ लाभ और जोड़ दें। अपने हिस्से के दलित आरक्षण में मुसलमान दलितों को उनकी हिस्सेदारी दे दें। यानि एससी सीटों पर मुसलमान पस्तमांदा को भी शामिल करने के लिए आंदोलन की शुरुआत करें। हम मान लेंगे कि दलित मुस्लिम गठबंधन बराबरी की शर्तों पर आ गया है। लेकिन ऐसा नहीं होगा।

हिंदू सवर्ण की तरह हिंदू दलित का हित भी मुसलमानों के बीच विभाजन में है। दलित पस्तमांदा भाई-भाई और जय मीम जय भीम का नारा लगवाकर अंतत: अपनी ही सत्ता बचाने का खेल है। मुसलमान को मुसलमान के ख़िलाफ खड़ा करके विभाजन किसके हित में है? ज़ाहिर है दलित/ओबीसी की राजनीति करने वालों के। वोट में विभाजन किया और अपनी सीट सुरक्षित कर ली। ज़रा कोई दलित या ओबीसी पार्टी बताए कि कभी उसने अपनी पार्टी में नेतृत्व मुसलमानों को दिया हो? मुख्यमंत्री नहीं बनाया चलिए मगर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने में क्या दिक़्क़त है? नहीं बनाएंगे। सिर्फ वोट चाहिए बराबरी नहीं देनी है।

ब्राह्मणवादियों को पानी पी-पीकर कोसने वाले माया, मुलायम टाइप लोगों ने कुल मिलाकर मुसलमानों को भारत में अछूत बनवा दिया है और ख़ुद वही कर रहे हैं जिसका सवर्णों पर इलज़ाम है। यूपी, बिहार में मुसलमान जाटव, यादव और कुर्मी राजनीति का ईंधन बने हुए हैं। वोट भी देंगे… चंदा भी… टिकट के लिए पैसे भी… भीड़ भी… और नारे लगाने, दरी बिछाने की ज़िम्मेदारी भी निभाएंगे। बदले में मिलते हैं भुने हुए चने और मरने कुटने का चिंदी भर मुआवज़ा।

माना सवर्ण की लडाई सत्ता की है लेकिन आपकी भी तो सत्ता की है। आप दोनों की सत्ता की लड़ाई में सवर्ण प्रतिनिधित्व जस का तस रहा और दलित हिस्सेदारी बढ़ गई, घटी किसकी? ज़ाहिर है हमारी। कई-कई बार आपके मुख्यमंत्री बन गए। हमें क्या मिला? बी-ग्रेड की हमारी नागरिकता सी-ग्रेड में तब्दील हो गई और हमारे सांसद, विधायक, मेयर घटते चले गए। हमारे वोटों पर राज आपका क़ायम हुआ नफरत हमारे खाते में आई। उपर से जब साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दे आ जाते हैं तो आप कहते हैं ये आपकी लड़ाई है। आप उस समय सबसे बड़े हिंदू होते हैं और हम मूर्ख।

बहरहाल ये तो हमारी समझ में भी आता है कि भारत के दलित पिछड़ों की लड़ाई सम्मान और बराबरी की है। सवर्ण कूट दे तो हमारा साथ चाहिए और वो गले लगाले तो हमसे रिश्ते ख़त्म। कुल मिलाकर हम ही मूर्ख हैं जो आपकी पालकी उठाए घूमते रहें। आपकी सुविधाएं… आपकी नौकरी और आपके आरक्षण को बचाने के लिए मरें और आप हमारी बेवक़ूफी के मज़े उठाएं। अल्लाह अल्लाह ख़ैर सल्लाह।

पत्रकार जैगम मुर्तजा की कलम से निजी विचार…

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