‘मटकोठा’ – गर्मी में ठंड और सर्दी में गर्मी का एहसास देने वाला मिट्टी से बना मकान

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मुहम्मद उमर अशरफ

मिट्टी से बने हुए दो फ़्लोर के मकान को ‘मटकोठा’ कहते हैं, ‘मिट्टी का कोठा’ यानी मिट्टी का छत। बड़ा ही शानदार होता है इस तरह का मकान जहां गर्मी के मौसम में आपको ठंड का एहसास होगा वहीं जाड़े के मौसम में क़ुदरती गर्मी का ऐहसास होता है।

दो फ़्लोर के इस मकान में जहां ग्राऊंड फ़्लोर ‘कच्चा’ यानी मिट्टी का होता है। वहीं फ़र्स्ट फ़्लोर भी बहुत हद तक कच्चा ही मगर ठोस होता है। फ़र्स्ट फ़्लोर का काम मिट्टी, प्वॉल, लकड़ी के बल्ले और कभी कभी पतले ईंट के मदद से मुकम्मल किया जाता है। वहीं सेकंड फ़्लोर को छप्पर और खपड़े की मदद से बनाया जाता है; जो आम तौर पर तीन कोनिया होता है।

‘मटकोठे’ की दीवार को पुरी तरह से मिट्टी और ईंट के मदद से बनाया जाता है। जिसमें पिलर नाम की कोई चीज़ नही होती है, ‘मटकोठे’ की उंचाई तक़रीबन बीस से पचीस फ़िट होती है, जहां दीवार का निचला हिस्सा काफ़ी चौड़ा होता है, वहीं जैसे जैसे दीवार उपर जाती है उसकी चौड़ाई कम होने लगती है।

शहरीकरण के इस दौर में लोग शहर में रहने लगे हैं, जिस वजह कर इस तरह की तमाम इमारत देख रेख की कमी के वजह कर हर बरसात के मौसम में ढह जा रही है, पर जहां आज भी इस तरह के मकान में लोग रह रहे हैं, वो मकान मेंटेन है, और आज भी उसी शान से खड़ी है जिस तरह वो डेढ़ – दो साल पहले खड़ी थी। कई बार लोग अच्छे भले ‘मटकोठे’ को कंक्रीट के जंगल में तब्दील कर देते हैं, मने तोड़ कर दो तीन फ़्लोर का पक्का मकान बना देते हैं, वैसे यमन का शिबम शहर ‘मटकोठों’ का शहर है, यहां के ‘मटकोठे’ दो फ़्लोर से ले कर ग्यारह फ़्लोर तक हैं जिनकी तादाद 500 से अधिक है।

कहा जाता है कि पहली बार इन इमारतों को 16वीं सदी में बनाया गया था, तब से यह परम्परा आज भी क़ायम है। शिबम शहर में करीब 7 हजार से अधिक लोग रहते हैं और ये मुख्यतः पशुपालन पर निर्भर करते हैं और अनपढ़ हैं। वहीं हमारे मगध के देहाती इलाक़े में मौजूद ‘मटकोठों’ को वो लोग नुक़सान पहुंचा रहे हैं जिनको पढ़ा लिखा कहा जाता है।

यमन के शिबम के इन इमारतों को साल 2008 में आए तूफ़ान की वजह कर काफ़ी नुकसान हुआ था, लेकिन वक़्त रहते इसमें सुधार कर लिया गया। फिर संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने 2015 में यमन के ‘ओल्ड वाल्ड सिटी ऑफ शिबम’ को संकटग्रस्त विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल किया है। ज्ञात रहे के पहले से इस शहर को युनिस्को द्वारा विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया था।

दूर से देखने पर आज भी शिबम का नज़ारा किसी आधुनिक शहर सा लगता है, इसीलिए इस शहर को ‘शिकागो ऑफ़ द डेज़र्ट’ या ‘मैनहटन ऑफ़ मिडिल ईस्ट’ कहा जाता है। और एक हम हैं जो रोज़ अपनी विरासत को अपने हाथ से बर्बाद कर रहे हैं और कहेंगे इस इमारत में क्या रखा है ? छोटी सी ही सही पर ये अपनी विरासत है। बचाईये इसे !! सुन रहे हैं ना ?? बचाईये

वैसे ये फ़ोटो मैने अरवल – औरंगाबाद ज़िला के बीच पड़ने वाले हसपूरा के ‘पीरु’ गांव में खैंचा है। वैसे अपना भी ‘मटकोठा’ था, देख रेख की कमी के वजह कर ढह गया, बाक़ी सब ठीक है।

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