“मजदूर एवं मजबूर” मोहम्मद इकबाल की चिट्ठी की ये लाइन हर एक मजदूर की हकीकत है

0
156

गरीब होना कितना बड़ा दुःख है, उस पर भी विकलांग संतान का अभिभावक होना इस दुःख को हजारों-हज़ार गुना बढ़ा देता है. दुनिया का कोई भी जीव अपनी संतान के लिए कुछ भी कर गुज़रता है, लेकिन जब वो जीव मानव हो और वो भी गरीब, तो उसकी बेबसी की कोई सीमा नहीं होती. अपने बच्चों को दुःख से बचाने के लिए माता- पिता कुछ भी कर गुज़रते हैं. शरीर से बेबस एक बच्चे के बेबस और मजलूम पिता ने अपने बच्चे के लिए साइकिल चुराई और वहां चिट्ठी लिखकर रख ​दी. ये चिट्ठी सोशल मीडिया में भी घूम रही है और पढने वालों की आँखों में आंसू ला रही है. ये चिट्ठी एक मजदूर की है. बरेली के मोहम्मद इकबाल ने शायद बेबसी की इन्तहा से गुज़र कर ही ये चिट्ठी लिखी होगी. इस चिट्ठी में लिखा है कि वो अपने विकलांग बेटे के लिए साईकिल चुरा रहा है. चिट्ठी के आखिर में लिखी लाइन ‘मजदूर और मजबूर’ सिर्फ इक़बाल ही नहीं, पूरे मजदूर समाज की हकीकत है.

मोहम्मद इकबाल ने अपने दिव्यांग बेटे के लिए भरतपुर के रारह से साइकिल उठा ली लेकिन इस साइकिल को उठाते हुए उसका ईमान गवाही नहीं दे रहा था. शायद बहुत मजबूर होकर इकबाल ने ये कदम उठाया. यही वजह है कि इकबाल ने साइकिल उठाते हुए उसके मालिक के नाम एक चिट्ठी लिखी और माफी मांगी. उसने चिट्ठी की शुरूआत में लिखा है कि मैं आपका कसूरवार हूं. मैं एक मजदूर हूं और मजबूर भी. मैं आपकी साइकिल लेकर जा रहा हूं. मुझे माफ कर देना. मेरे पास कोई साधन नहीं है और मुझे अपने विकलांग बच्चे को ​लेकर बरेली तक जाना है. बता दें कि रारह, राजस्थान और उत्तरप्रदेश की सीमा के पास का इलाका है. यहां प्रतिदिन सैकड़ों की तादाद में श्रमिक यूपी की ओर पलायन कर रहे हैं. भरतपुर के रारह के निकट गांव सहनावली निवासी साहबसिंह की साइकिल बुधवार रात बरामदे से गायब हो गई. साहब सिंह ने साइकिल बहुत खोजी लेकिन नहीं मिली. अगली सुबह बरामदे में झाड़ू लगाते हुए समय कागज का एक छोटा सा टुकड़ा मिला.

यह कागज का टुकड़ा मोहम्मद इकबाल की चिट्ठी थी उसने अपना दर्द बयां किया था. इस चिट्ठी को पढ़कर साहबसिंह की आँखें भर आईं. उसने कहा कि उसे साइकिल चोरी हो जाने पर बहुत आक्रोश और चिंता थी लेकिन इस चिट्ठी को पढ़कर मेरा गुस्सा अब संतोष में बदल गया है. मेरे मन में साइकिल ले जाने वाले मोहम्मद इकबाल के प्रति कोई द्वेष नहीं है बल्कि यह साइकिल सही मायने में किसी के दर्द के दरिया को पार करने में काम आ रही है. इस भावना से उसका मन प्रफुल्लित हो गया है. साहबसिंह ने कहा कि मजबूर और मजलूम मोहम्मद इकबाल ने बेबसी में आकर ऐसा काम किया. अन्यथा बरामदे में और भी कई कीमती चीजें पड़ी थी पर उसने उन्हें हाथ नहीं लगाया.

मोहम्मद इकबाल कहां से आया था, क्या करता था और उसके साथ और कौन था इस विषय में कहीं कोई सूचना नहीं मिल सकी है. उसे बरेली में कहां जाना था इस बारे में भी कुछ पता नहीं चल सका है. इस बात की पूरी संभावना है कि वह राजस्थान और गुजरात के उन हजारों प्रवासी मजदूरों में से ही एक था जो इन दिनों अपने गांव, शहर और घर पहुंचने की जद्दोजहद में तपती धूप, गर्मी, ओले, बारिश, भूख, प्यास, थकान, निराशा, आँसू, छाले और तमाम जख्म अपने तन-मन में लिए बस चलते ही चले जा रहे हैं. इन प्रवासी मजदूरों में अधिकांश ऐसे हैं जिनके पास कोई साधन नहीं हैं. बस यही प्रार्थना है कि मोहम्मद इकबाल अपने बच्चे के साथ अपनी मंजिल तक पहुंच सके.