कोरोना वायरस…ये वो नाम है जिससे आज दुनिया का चप्पा-चप्पा वाकिफ है. इस वायरस ने पिछले कुछ महीनों से पूरी दुनिया को घुटने टेकने पर मजबूर किया हुआ है. कोरोना वायरस के लिए वैक्‍सीन खोजने में आज पूरी दुनिया के रिसर्चर्स जुटे हैं. 120 से ज्‍यादा ऐसी वैक्सीन तैयार हो चुकी हैं, जो कोरोना की प्रभावी वैक्सीन बनने की दौड़ में हैं. इनमें से कम से कम 10 वैक्‍सीन ऐसी हैं जिनका क्लिनिकल ट्रायल चल रहा है. इनमें ‘मॉडर्ना’ की एमआरएनए-1273 और ऑक्‍सफर्ड की एजेडडी1222 भी शामिल हैं. एजेडडी1222 दुनिया की पहली ऐसी कोरोना वैक्‍सीन है जो टेस्टिंग के तीसरे चरण में दाखिल हो चुकी है. उसके प्रॉडक्‍शन का जिम्‍मा ब्रिटिश फार्मा कंपनी ‘अस्ट्राज़ेनेका’ पर है. ‘अस्ट्राज़ेनेका’ ने भारत में सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया (एसआईआई) से टाईअप किया है. एसआईआई ने इस साल के आखिर तक 400 मिलियन डोज तैयार करने पर हामी भरी है. यानी दुनिया की ‘सबसे अडवांस्ड’ कोरोना वैक्‍सीन का उत्पादन भारत में भी हो रहा है. इसके अलावा यूके, नॉर्वे, स्विट्जरलैंड की फैक्ट्रियों में भी यह वैक्‍सीन तैयार की जा रही है.

इस समय पूरी दुनिया कोरोना वायरस की वैक्सीन तैयार होने का इंतजार कर रही है. जिस तरह से इतने बड़े पैमाने पर अलग-अलग देश वैक्‍सीन के ट्रायल में जुटे हैं, दुनिया के किसी कोने से जल्‍द ही ये खुशखबरी आ सकती है. भारत की चार वैक्‍सीन भी शुरुआती नतीजों में शानदार साबित हुई हैं और अब एडवांस्‍ड स्‍टेज में हैं. इसके अलावा अमेरिका और चीन की वैक्‍सीन भी सकारात्मक परिणाम दे रही हैं. जनवरी में ऑक्‍सफर्ड वैक्‍सीन ग्रुप और जेनर इंस्‍टीट्यूट ने वैक्‍सीन पर रिसर्च शुरू की थी. शुरू में 160 स्‍वस्‍थ लोगों पर परीक्षण हुआ. अब यह वैक्‍सीन फेज 3 में हैं. इसे आम सर्दी-जुकाम देने वाले वायरस से बनाया गया है. यह शरीर में स्‍पाइक प्रोटीन के प्रति इम्‍यून रेस्‍पांस पैदा करेगी और इन्‍फेक्‍शन को फैलने से रोकेगी. इस वैक्‍सीन का बड़े पैमाने पर उत्पादन भी शुरू हो चुका है. अमेरिकन कंपनी मॉडर्ना की एमआरएनए वैक्‍सीन भी इम्‍यून सिस्‍टम को कोरोना के स्‍पाइक प्रोटीन को पहचानने की ट्रेनिंग देने की कोशिश करती है. यह वैक्‍सीन फिलहाल फेज 2 ट्रायल में है. कोरोना वायरस का जेनेटिक सीक्‍वेंस पता चलने के 66 दिन के भीतर ही इस वैक्‍सीन का ह्यूमन ट्रायल शुरू हो गया था.

कोरोना वैक्‍सीन बनाने में दुनिया की दिग्‍गज यूनिवर्सिटीज से लेकर फार्मा कंपनियां जुटी हुई हैं. बायोएनटेक, नोवावाक्स, सिनोवाक, पीफिज़र के अलावा कई वैक्‍सीन ट्रायल के पहले या दूसरे दौर में हैं. आमतौर पर वैक्‍सीन बनाने में 10 साल का समय लगता है. मगर कोरोना ने जैसे हालात पैदा किए हैं, उसे देखकर जल्‍द से जल्‍द इसका टीका खोजने की कोशिश है. कई एक्‍सपर्ट्स को उम्‍मीद है कि साल के आखिर तक वैक्‍सीन मिल जाएगी. मगर फिर उसके प्रॉडक्‍शन और डिस्‍ट्रीब्‍यूशन से जुड़ी चुनौतियां सामने होंगी. हालाँकि ऐसे विशेषज्ञ भी हैं जो लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि एड्स की तरह शायद कोरोना वायरस की वैक्सीन भी कभी नहीं बन पायेगी. उनका दावा है कि अब दुनिया को इस वायरस के साथ ही जीना होगा. हालांकि बहुत सारे साइंटिस्‍ट्स उम्‍मीद से लबरेज दिखते हैं और साल के आखिर या अगले साल की शुरुआत तक वैक्‍सीन डेवलप हो जाने का दावा कर रहे हैं.