पिछले 6 महीनों में दुनिया के कोने-कोने तक कोरोना वायरस पहुंच चुका है. अब तक 82 लाख से ज्यादा लोग इससे प्रभावित हो चुके हैं.अब तक तक़रीबन साढ़े 4 लाख मरीजों की मौ’त हो चुकी है, वहीं कई जिंदगी की जंग ल’ड़ रहे हैं. हालाँकि कोरोना वायरस की वैक्सीन तैयार हो चुकी है, लेकिन अभी वैक्सीनों का परीक्षण जारी है. कई अलग-अलग बिमारियों में दी जाने वाली दवाओं से इसका इलाज किया जा रहा है. ऐसे ही मरीजों के लिए डेक्सामेथासोन दवा कारगर साबित हुई है. माना जा रहा है कि शुरुआत से ही दूसरी दवाओं की बजाए इस दवा के बारे में पता लग पाता तो मृ’त्युदर काफी कम की जा सकती थी. अकेले ब्रिटेन में ही 5 हजार से ज्यादा लोगों की जान बचाई जा सकती थी. बता दें कि ब्रिटेन में यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑक्सफ़ोर्ड के वैज्ञानिकों ने इसपर शोध किया है.

ये एक कम कीमत का स्टेरॉइड है जो भारत में भी हर जगह उपलब्ध है. ये दवा पहले से ही गठिया, खून की बीमारियों और सूजन कम करने में इस्तेमाल होती आई है. साथ ही एलर्जी और कई तरह के चर्म रोगों में ये दी जाती है. अब तक भारत में कोरोना के इलाज के लिए ये दवा नहीं दी गयी है. दुनियाभर में डॉक्टर कोरोना के गंभीर मरीजों की हालत सुधारने के लिए ये दवा दे रहे हैं. कई जगहों पर अलग से इसके ट्रायल भी हो रहे हैं. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में इसके ट्रायल के लिए 2,104 मरीज लिए गए और इन्हें रोज 6एमजी दवा लगातार 10 दिनों तक दी गई. इसके साथ ही इनकी तुलना उन 4,321 मरीजों से की गई, जिन्हें ये दवा नहीं दी जा रही थी.

इसमें पाया गया कि ऐसे मरीज जिनमें कोरोना की गंभीरता के कारण वेंटिलेटर पर रखना पड़ता है, उनमें मौ’त का ख’तरा डेक्सामेथासोन से 1 तिहाई फीसदी कम किया जा सकता है, वहीं जिन्हें ऑक्सीजन देना पड़ रहा हो, उनमें मौ’त का खत’रा पांचवे हिस्से के बराबर घट जाता है. हालांकि गौर करने वाली बात ये भी है कि जिन मरीजों की हालत गंभीर नहीं थी या जिन्हें ऑक्सीजन की जरूरत नहीं पड़ी, उनपर इस दवा का कोई असर नहीं देखा गया. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में संक्रामक बीमारियों के विशेषज्ञ पीटर हॉर्बी ने शोध का नेतृत्व किया था. नतीजों को देखते हुए उन्होंने माना कि ये पहली ऐसी दवा है, जिसे देने पर मरीजों में मौ’त की दर में काफी कमी देखी गई. खासकर गंभीर मरीज, जिनमें मृ’त्यु दर काफी ज्यादा रहती है, उनमें ये जान बचाने वाली साबित हो रही है. फिलहाल यह एक बड़ी कामयाबी मानी जा रही है.

इसी तरह से शोध में शामिल प्रोफेसर मार्टिन लैंड्रे के मुताबिक दवा देने पर वेंटिलेटर की मदद से हर 8 मरीजों में से 1 की जान बचाई जा सकती है. साथ ही जिन्हें ऑक्सीजन देना पड़ रहा है, उनमें हर 25 मरीजों में से 1 को बचाया जा सकता है. यानी मौ’त की दर कम करने में कोरोना के लिए ये पहली कामयाब दवा है. कोरोना के इलाज में लग रही भारी-भरकम रकम की अपेक्षा ये इलाज सस्ता और हर जगह मिल सकता है. इसमें एक दिन का खर्च 478 रुपए आता है. इस हिसाब से 10 दिन के डोज का खर्च लगभग 3,350 रुपए है. इसमें दूसरे खर्च शामिल नहीं हैं. वैसे डेक्सामेथासोन के अलावा कई दूसरी दवाओं पर भी ट्रायल चल रहा है. जैसे इनमें हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन एक दवा है, शुरुआत में जिसे काफी कारगर सोचा गया था लेकिन ट्रायल में इसके नतीजे खराब रहे.

अप्रैल में एफडीए ने कोविड-19 के इलाज के लिए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा के इस्तेमाल की औपचारिक अनुमति दे दी थी और भारी मात्रा में भारत भी इसे दूसरे देशों को देने लगा था. हालांकि बहुत से मरीजों पर इसके गंभीर दुष्परिणाम देखे गए. हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन में कुछ ऐसे गुण होते हैं जो दिल की धड़कन तेज कर देते हैं. इस हालत के कारण मरीज को टचीकार्डिया हो सकता है यानी तेज धड़कन से दिल का दौरा पड़ना. रिसर्च वेबसाइट मेद्र्क्सिव में भी इसी आशय की स्टडी आई है, जिसके तहत 81 मरीजों पर हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का असर जांचा गया. इसके नतीजे कहते हैं कि इसके लंबे डोज से मरीज की मौ’त तक हो सकती है. एनवाईयू में भी हाल ही में 84 मरीजों पर इस दवा का उपयोग देखा गया. इसमें से 4 मरीजों की दिल के दौरे से मौ’त हो गई, जबकि इलाज से पहले उनमें किसी तरह की कार्डियक समस्या नहीं थी. इसी तरह से रेमडेसिवियर से कोरोना के मरीजों को दिया जा रहा है. ये हल्के लक्षणों वाले कोरोना मरीजों पर असरदार है, जबकि गंभीर रूप से बीमारी मरीजों पर इसका खास फायदा नहीं दिख सका है.